गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

शुभ-विवाह

 

 मुन्नीलाल यादव के सुपुत्र  चि.भूपेशसिंह व राजबहादुर यादव की सुपुत्री कु. अर्चना 30 नवम्बर 2012
को  परिणय - सूत्र में बँध  गए।  यह शादी चंडीगढ़ के  सेक्टर 33 स्थित समूहिंक केंद्र में बड़े धूम-धाम से संपन्न हुई । मुन्नी लाल यादव जाने-समाज सेवक हैं। समाज में उनका  बहुत मान-सम्मान है। उनकी पत्नी बिमला यादव सरल स्वाभाव वाली धर्म-परायण महिला हैं। वर-वधु को आशीर्वाद देने वालों में अन्य गणमान्य व्यक्तियों के अतिरिक्त दूल्हे राजा के 90 वर्षीय प्रपिता श्री रामनिहोर यादव  भी शामिल थे। सौहादपूर्ण वातावरण में  संपन्न इस विवाह से जहाँ दोनों परिवारों में प्रसन्नता छायी रही, वहीँ बधाई देने वाले शुभ चिंतकों की आवा-जाही से  कई दिनों तक उनके घर  रौनक भी लगी रही।

यादव समाज वर-वधु को शुभ आशीर्वाद  देते हुए कामना करता है कि  वे   सुखी, स्वस्थ्य और 
सम्पन्न  रहे, सदा प्रगति के पथ पर  अग्रसर रहे।  परमपिता परमात्मा उनका जीवन खुशियों से भर दे।   
जय श्रीकृष्णा !



शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

प्रभु पल पल सन्देश देता है

                                       

परमपिता परमेश्वर सृष्टि  के रचयिता है। वे  कण कण में विद्यमान  हैं।  वे सर्व व्यापक और सर्वशक्तिमान  है सृष्टि की  प्रत्येक  वस्तु परमात्मा  के  अंश से निर्मित  है और उनके अधीन है ।  इन्ही  वस्तुओ के माध्यम से   सांकेतिक भाषा में     भगवान जहाँ  भक्तों को  शुभ कार्यों  के प्रति     प्रेरित करते  है  वहीँ तुच्छ कार्यों के प्रति   सावधान  भी करते  है। ईश्वर  ने मनुष्य को सही और  गलत को समझने की  शक्ति दी है।सच्चा  ईश्वर -भक्त समझदार होने के कारण  प्रभु  के  सांकेतिक मार्गदर्शन  को आसानी से समझ लेता है और उसके अनुसार सही मार्ग पर चलते  हुए अमरत्व रुपी फल का  अधिकारी  बनता  है,  जबकि  अंध-विश्वासी नासमझ इंसान  प्रभु की आवाज़  का अर्थ समझने में असमर्थ होता  है।  इस कारण वह  अकर्मण्य बन जाता है   और अकारण  ही  डूब मरता है।

एक  समय की बात है किसी नदी के किनारे एक छोटा सा गाँव था।  गाँव के बाहर  एक  मंदिर था। मंदिर के प्रांगण में एक  बाबा जी रहते थे । उनका एक मात्र काम था मंदिर में पूजा पाठ करना और  भगवान का गुणगान  करना  । वे अपमा गुजर-बसर चढ़ावे के रूप में मन्दिर से  प्राप्त अन्न-धन  से    करते थे ।

 एक बार  नदी में भयंकर  बाढ़ आ गई।  गाँव के सब लोग अपने अपने प्राण बचाने के लिए वहां से भागने लगेलोगो ने बाबा जी को भी वहां से चले  जाने का आग्रह किया।  किन्तु  बाबा जी  नहीं माने । उन्होंने लोगों से कहा-" आप सब  अपने  प्राण बचाइएमेरी चिंता मत कीजिये , मैं सी  मंदिर  में रहूँगा।   यहाँ भगवान  विद्यमान है,  निश्चित  वह  मेरे प्राण भचायेंगें" तब गाँव के सभी  लोग उदास मन से,  बाबा जी के बिना  सुरक्षित स्थान पर चले गए।

 नदी का  जल स्तर पल दर पल  बढ़ता  जा रहा था। स्थिति   भयावह  होती  देखकर  गाँव का एक  मल्लाह    नाव लेकर  आया  और विनीत  स्वर में  बोला -'"महराज  जी!   यहाँ  रहना खतरे  से  खाली  नहीं है। जल स्तर  तेजी से बढ़ रहा है।महराज! आप  इस  नाव  में  बैठ जाइये।  मैं  आपको सुरक्षित स्थान पर पहुँचाये  देता हूँ ।"   

बाबा जी नहीं माने।  उन्होंने मंदिर को  छोड़कर  अन्यत्र  जाने से साफ़ इंकार कर दिया।

पानी तीव्र गति से मंदिर में घुसने  लगा। बाबा जी के डूब जाने का खतरा मंडराने लगा। संयोगवश  बचाव दल के कुछ सैनिक  हैलीकाप्टर  लेकर वहाँ  आये। सैनिकों ने हैलीकाप्टर को ऊपर रोक कर  एक सीढीनुमा   रस्सी नीचे  लटकाई और   बाबा जी को समझाते हुए बोले -"  महात्मा जी !  आप इस रस्सी के सहारे हैलीकाप्टर में आकर  बैठ जाइए अन्यथा  आपके प्राण नहीं बचेंगें।"

 "आप लोग ब्यर्थ परेशान हो रहे हैं , मैं कहीं नहीं जाउंगा, मेरी रक्षा के लिए भगवान स्वयं यहाँ आएंगे।"बाबाजी  ने सैनिको से कहा।

नदी उफान पर थी।   ऊँची ऊँची लहरें उठ  रही थी। भयानक भंवर घुमर रहे थे।   चारों तरफ जल ही जल दिखाई दे रहा था।  बाढ़ ने ऐसा विनाशकारी  रूप धारण किया कि  देखते ही देखते सारा गाँव पानी में डूब गया। बाबाजी भी पानी की  तेज धारा में बहने लगे। मृत्यु को सिर पर मंडराती देख कर बाबाजी डर गए।  उन्हें  प्राणों  का मोह सताने लगा।   बचने के लिए    पानी में  हाथ पाँव पटकने लगे। किन्तु तब  तक बहुत देर  चुकी थी।  चिड़िया खेत चुग कर जा चुकी थी।  बाबाजी के  सभी प्रयत्न बेकार साबित हुए। लहरों के बीच डूबते उतराते हुए उनके प्राण पखेरू उड़ गए।

मरने के बाद जब बाबा जी को  स्वर्ग में  भगवान के सामने लाया गया।   तब उन्होंने   उलाहना देते हुए भगवान से पूछा - "हे जग के पालनकर्ता ! हे भगवन!  मैं  जीवन  पर्यन्त आपकी पूजा-पथ पाठ,भक्ति करता रहा। सदैव आपकी  सेवा में लगा रहा , किन्तु डूबते समय आपने मुझे तनिक भी सहारा नहीं दिया।   मुझे बचाने  नहीं आये । क्या यही है आपकी  भक्ति और  सेवा का फल ?"  

 बाबा जी के मुख से ऐसी  वाणी सुनकर  भगवान ने मुस्करा कर कहा- "महात्मा जी!   मै पल पल आपको बचने का अवसर  देता रहा। आपको बचाने के लिए  मेरे सेवक  तीन  बार आपके पास   आये ,  किन्तु आपने  । सर्वप्रथम    ग्रामीणों के माध्यम से  बचाने का प्रयास किया  जिन्होंने आपको  सुरक्षित  स्थान पर  जाने का आग्रह किया।  आप नहीं माने।  फिर  नाविक   नाव लेकर आया।  और अंत मुझसे  प्रेरित   सैनिक   हैलीकॉप्टर  लेकर  आये.   मै आपको बचाने का प्रयत्न करता रहा, आप  मेरी बात मानने से इंकार करते रहे । अब आप ही बताइए मेरा इसमें  क्या दोष  ? आपने मेरी भक्ति मन से नहीं  तन से की है। आपकी  सेवा दिखावटी थी अन्यथा मानव मुखं से निकली मेरी वाणी को अवश्य पहचान लेते और मेरी बात मानकर सुरक्षित स्थान पर चले जाते ।" 
      
भगवान  के श्रीमुख से ऐसी बात सुनकर बाबा जी  को अपनी गलती का अहसास हुआ। वे समझ गए कि परमपिता परमेश्वर सृष्टि  के रचयिता है। वे  सर्व व्यापक है, कण कण में विद्यमान  हैं सृष्टि की  प्रत्येक  वस्तु परमात्मा  के  अंश से निर्मित  है और उनके अधीन है ।  इन्ही  वस्तुओ के माध्यम से   सांकेतिक भाषा में     भगवान जहाँ  भक्तों को  शुभ कार्यों  के प्रति     प्रेरित करते  है  वहीँ तुच्छ कार्यों के प्रति   आगाह भी करते  है। ईश्वर  ने मनुष्य को सही और  गलत को समझने की  शक्ति दी है।सच्चा  ईश्वर -भक्त समझदार होने के कारण  प्रभु  के  सांकेतिक मार्गदर्शन  को आसानी से समझ लेता है और उसके अनुसार सही मार्ग चलते  हुए अमरत्व रुपी फल का  अधिकारी  बनता  है,  जबकि  अंध-विश्वासी नासमझ इंसान  प्रभु की आवाज़  का अर्थ समझने में असमर्थ होता  है इस कारण वह  अकर्मण्य बन जाता है   और अकारण  ही  डूब मरता है।

प्रभु सचमुच  पल पल सन्देश देता  है। समझदार समझ लेता है, नासमझ डूब मरता है। 


                                           जय श्री कृष्ण!!

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

नंदमहर धाम


नंदमहर  धाम

उत्तर प्रदेश के  अमेठी जिले के मुख्यालय गौरीगंज से मुसाफिरखाना मार्ग पर 16 किलोमीटर की दूरी बसा यह स्थान पौराणिक महत्त्व समेटे हुए है।  यह  यादवों का एक प्रमुख धार्मिक स्थल  है। इस स्थान का प्रादुर्भाव कब हुआ इस विषय में कई मत प्रचलित हैं। एक किंवदंती के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम के साथ पौंड्रक नामक घमंडी राजा  को मारने के लिए द्वारिका से काशी गए हुए थे। तब वसुदेव और नंदबाबा उनको खोजते हुए यहाँ  आये थे। उस समय यहाँ घना जंगल था। पौंड्रक  को मारकर श्रीकृष्ण बलराम के साथ  द्वारिका वापस  जा रहे थे,  उस  समय नन्दबाबा  और वसुदेव से उनकी मुलाकात  इसी स्थान पर हुई। सभी लोगों ने यहाँ तीन दिन तक विश्राम किया।  उसी दौरान यहां एक यज्ञ का आयोजन भी  किया गया।  नंदबाबा ने भगवान की मूर्ति स्थापित करके उनकी पूजा की थी। श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव और नंदबाबा के चरणरज से यह स्थान  पवित्र हो गया। यदुवंशियों के पूर्वज होने के कारण  यह स्थान उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बन गया। तभी से लोग यहाँ अनवरत यज्ञ, हवन और  पूजा करते आ रहे हैं। प्रभु की याद में धाम के पड़ोस में बसे तीन गांवों का नाम इस प्रकार है-हरि (श्रीकृष्ण) के नाम पर हरिकनपुर, वसुदेव के नाम पर बसयातपुर और नन्द के नाम पर नदियाँवा। 
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नन्दबाबा ने जिस स्थान पर पूजा की थी, वहां पहले  मिट्टी का चौरा (चबूतरा) था। किन्तु बाद में, सन 1956 ई. में ,  उस चौरे के स्थान पर मंदिर का निर्माण करावाया  गया। उस मंदिर  के भीतर  मूर्तिकक्ष में प्रत्येक मंगलवार को  गाय और भैंस  का  दूध चढ़ाये जाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि  गाय भैंस के बियाने के बाद आगामी  पांच मंगलवार  यहाँ दूध  चढाने  से वह गाय भैंस स्वस्थ रहने के साथ  बहुत  दिनों  तक अधिक  दूध देती है। जाति-पाति का भेदभाव किये बिना  सभी धर्मों और समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मंगलवार को यहाँ  दूध चढाने आते है।
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यह स्थान 'राजाबली' और 'पंवरियां' की पूजा के लिए  बहुत प्रसिद्द है. उल्लेखनीय है कि इस  क्षेत्र के अधिकांश यदुवंशी  'राजाबली' और 'पंवरियां' नामक देवता की पूजा करते हैं। उन पुजारियों को ओझा कहा जाता है। पारम्परिक समाज में मान्यता  है कि ओझा में प्रत्यक्ष दुनिया से बाहर किसी रूहानी दुनिया, आत्माओं, देवी-देवताओं या ऐसे अन्य ग़ैर-सांसारिक तत्वों से सम्पर्क रखने या उनकी शक्तियों से लाभ उठाने की क्षमता होती है। ओझाओं के बारे में यह धारणा भी है कि वे अच्छी और बुरी आत्माओं तक पहुँचकर उनपर प्रभाव डाल सकते हैं और  ऐसा करते हुए अक्सर वे किसी विशेष चेतना की अवस्था में होते हैं। ऐसी अवस्था को  किसी देवी-देवता या आत्मा का 'चढ़ना' या 'हावी हो जाना' कहतें हैं। यह प्रथा कमोबेश आधुनिक समाज में भी मान्य है, किन्तु अधिकांश लोग इसे अन्ध-विश्वास मानते हैं। नंदमहर धाम में आने वाले ओझा लोग  राजबली और पवंरिया के पुजारी होते हैं और विशेष चेतना अवस्था में इनके ऊपर इन्ही देवताओं की सवारी होती है।कई पुजारी  प्रत्येक मंगलवार को नियमित रूप से नन्दमहर धाम आते है और अपने ईष्टदेव अर्थात राजबली महाराज और पवंरिया  के नाम की हवन करते हैं।  पचरा जो कि रिझाने वाला गीत है उसको गाकर महाराज को प्रसन्न करते है और उनकी अलौकिक शक्तियों के द्वारा  कथित उपरी हवा, भूत,-प्रेतों  आदि बुरी आत्माओं से  पीड़ित लोगों का इलाज करते हैं।
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राजाबली और पवंरिया कौन हैं? इसके बारे में मंदिर के महंत भारतनन्द का कहना है कि रोहिणी नंदन  बलराम को राजाबली  और उनके अंगरक्षक को पंवरिया
कहा जाता है.नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया द्वारा प्रकाशित  हिन्दी समातर  कोश में  भी 'बली' का अर्थ 'बलराम (दाऊ)' और   पवंरिया का  अर्थ 'पहरेदार'  बताया गया  है। इससे स्पस्ट होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण के भ्राता श्री बलरामजी को राजबली  और उनके सेवक को पवंरिया  कहा जाता है। शक्ति और पराक्रम के  प्रेरणा-श्रोत होने के कारण  लोग बड़ी श्रद्धा और विश्वास से उनकी पूजा करते हैं।
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प्रति वर्ष कार्तिक मास की  पूर्णिमासी  को यहाँ   बहुत बड़ा  मेला लगता हैं. इसे  नन्दमहर बाबा का मेला कहा जाता है. इसे यादवों का महाकुम्भ भी कहा जाता है। उस दिन वहां  श्रद्धालुयों का जनसैलाब देखते ही बनता है। सुल्तानपुर, फैजाबाद,बाराबंकी, आजमगढ़,  बहराइच, गोंडा, आंबेडकर नगर, प्रतापगढ़, रायबरेली आदि  अनेक जिलों के श्रद्धालु  बड़ी  संख्या में  यहां हरि  दर्शन हेतु आते है। एक अनुमान के  अनुसार दो दिन तक चलने वाले इस यादव-महाकुम्भ  में लगभग एक लाख श्रद्धालु शिरकत करते है।  व्रत धारण किये हुए ओझा लोग यहाँ  हर्ष-उल्लाष के साथ, ढोल नगाड़ों की थाप पर, राजाबली  और पंवरिया की   पूजा  करते है। दीपावली की भाँति मिट्टी के  बने दीयों में जगमगाते  दीप के द्वारा  हवनकुण्ड को सजाया जाता है। तदोपरांत  विधि-पूर्वक  हवन की जाती  है।  सभी पुजारियों का  हवन-कुण्ड अलग-अलग होता है। सामूहिक रूप से हवन करने  की प्रथा नहीं है। मंदिर के  प्रांगण में भक्तों द्वारा राजाबली महाराजऔर पवंरिया के नाम का  'निशान'  चढ़ाये जाने की परंपरा भी  है। यह दृश्य उस दिन का  मुख्य आकर्षण होता  है।  रंग-विरंगे कपड़ों से बने  अनेक  झंडियों वाले  ध्वज या  पताके  को 'निशान' कहा जाता है। निशान चढाने के लिए भक्तगण  मीलों पैदल चल कर, हथेली पर प्रज्वलित दीप थामे, राजबली महाराज के नाम का मन्त्र गुन -गुनाते नंदमहर धाम तक पहुंचते है।  कन्धों  पर  ध्वज उठाये हुए अन्य व्यक्ति उनके पीछे-पीछे चलकर आते हैं।  काबिलेगौर है कि इस दौरान रास्ते  में ना तो ज्योति  बुझने दी जाती  है और नहि ध्वज को पृथ्वी पर रखने दिया  जाता हैं।   ऐसे सैकड़ों  ध्वज  प्रति-वर्ष  यहाँ चढ़ाये जाते हैं। रंग-विरंगे लहराते झंडों से सजा  नन्दमहर धाम उस दिन बहुत  शोभायमान होता  है।

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जय श्रीकृष्ण
          









जय श्रीकृष्ण

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

संत की संगति का परिणाम



बहुत    पहले  की बात है।  किसी   उजड्ड  व्यक्ति  ने  चोरों  का एक गिरोह बनाया  हुआ था। गिरोह में कई चोर शामिल   थे। वह उन सबका सरदार था। रात के अँधेरे में दूर-दराज के  गाँवों में जाकर  चोरी करना उनका नित्य का  काम  था।  चोरी से प्राप्त  धन को बराबर बराबर  बाँट लिया करते थे। उसी से  अपने परिवार का भरण -पोषण करते थे।  यह सिलसिला सालों से चलता  आ रहा था।  इलाके में  रोज कहीं न कहीं चोरी  हो जाया करती थी।  इससे वहाँ  के लोग बहुत परेशान  थे।

सरदार  के घर से थोड़ी  दूरी पर बाग़ था। उसमें  में  सुन्दर सी एक कुटी थी।  कुटी में  सीधे-सादे  किन्तु उच्च विचारों वाला एक साधु  रहता था।  वह  सदैव भगवत-भक्ति में लीन रहता था। एक दिन महात्मा जी कुटी के बाहर  टहल रहे थे। चोर सोद्देश्य उधर से जा रहा था। महात्मा जी के  तेजस्वी और शांत  स्वरुप को देखकर  उसके मन में स्वतः ही सद्गुण आने लगे । उसका कठोर  ह्रदय द्रवित  होने लगा। उसके  मन में महात्मा जी के निकट जाकर उनके दर्शन  करने की अभिलाषा हुई। 

सरदार साधु के पास गया।  उनके  चरणों में गिरकर  दंडवत प्रणाम  किया। महात्मा जी उसके बारे में सब कुछ जानते थे। फिर भी उन्होंने उसका यथोचित सत्कार किया ।  उसका तथा उसके परिवार जनों का कुशल-क्षेम पूछा। चोर ने महात्मा से  कहा, "हे महात्मन !  मेरे यहाँ सब कुशल है। मुझे केवल एक चिंता खाए जा रही है। मैंने जीवन भर चोरीं की  है। दूसरों का धन लूटा है। मेरे पाप की गठरी भर  गई है। आप संत महात्मा हैं। प्रभु के अनन्य भक्त  और बड़े दयालु है। मुझ पर भी कुछ दया कीजिये। मुझे इस पाप से छुटकारा दिलाइये और मेरे उद्धार का मार्ग बताइए।"

चोर  की बात सुनकर महात्मा जी समझ गए कि उसका  ह्रदय परिवर्तित हो रहा  है। पाप कर्मों का त्याग कर अब यह पाश्चाताप करना चाहता है। इसे  सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इसे  भगवत भक्ति का कोई सरल उपाय बताना चाहिए, जिससे यह पाप कर्मो  से मुक्ति पा सके।

शांत भाव से  कुछ  देर तक मनन  करने के बाद महात्मा जी ने  चोरों के उस सरदार से  कहा," सरदार! यदि तुम सचमुच अपना कल्याण चाहते हो तो  मेरी  दो बातें   सदा  याद रखनी होगी और उनका पालन करना होगा ।"

 चोर बोला "महात्मा जी!  मैं आपकी बताई  हुई हर बात  याद रखूंगा और  जीवन भर कड़ाई से  पालन करूँगा ।  शीघ्र ही उपाय बताइए।"

तब एक शंख देते हुए महात्मा जी ने उसको  कहा -"हे सरदार! आज के बाद  जब भी  तुम्हें भोजन की इच्छा हो,  तो भोजन ग्रहण करने से  पहले पालथी मार कर पृथ्वी पर बैठ जाना। भोजन का कुछ अंश भगवान् को अर्पित करना।   कुछ देर  तक अपने मन में परमपिता परमेश्वर का  ध्यान  लगाये रखना। फिर यह शंख बजाना और उसके बाद  भोजन ग्रहण करना।"

" महात्मन !  आपके इस उपदेश का मैं सदैव पालन करूंगा। शीघ्र  ही दूसरी बात बताइए।" चोर ने साधु से कहा।

दूसरा मन्त्र देते हुए महात्मा जी ने  कहा-" जीवन में कभी झूठ मत बोलना।इतना कह कर महात्मा जी उठ खड़े हुए और कुटी के अंदर जाकर  प्रभु-भक्ति में लींन  हो गए।  चोर  अपने घर लौट आया।

 चोरों के उस सरदार ने चोरी करना बंद कर दिया।  सरदार के बिना उसके साथी चोरी करने से डरते थे।  इस कारण उन्होंने  भी यह  काम बंद कर दिया ।   चोरी के अतिरिक्त   आजीविका  का अन्य   साधन  उनके पास  था ही  नहीं।  चोरी करना बंद कर दिया तो उनकी आमदनी भी बंद हो गई। दिन प्रतिदिन उनकी आर्थिक दशा  बिगड़ने लगी। अंततः हालात इतने बिगड़ गए कि उनको खाने के लाले पड़  गए। उनके  घरों में कलह शुरू हो गई। बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे। भूख से बिलबिलाते  बच्चों का रोना-धोना उनसे  देखा नहीं गया। तब  उन सबने  पुनः चोरी शुरू करने का निश्चय किया।  इस काम के लिए सरदार का साथ होना आवश्यक था -यह सोचकर वे सरदार  को मनाने उसके घर गए।सरदार  को  सारी  समस्या बताई और    चोरी करने के लिए साथ चलने का  आग्रह किया । सरदार ने  यह  घृणित कार्य पुनः आरम्भ  करने से साफ़ मना  कर दिया। तब उसके साथियों ने कठोर शब्दों में  कहा-"सरदार! हमें बचपन से चोरी करना तुमने ही सिखाया था।  तब  से हम  यही  काम करते आ रहे रहे हैं।  धन  कमाने का  कोई  दूसरा उपाय  हमने  सीखा ही नहीं। यदि तुम इस बुरे मार्ग पर न ले गए होते, तो हम सब ने इज्जत वाला कोई अच्छा काम किया  होता।   चोरी करना बंद कर दिया, तो अब  हमारी  दुर्दशा हो रही है। हमारे घरों में खाने के लिए कुछ  भी  नहीं बचा है । बच्चे भूखे से मर रहे है। यह सब तुम्हारे कारण हो रहा है। अब  तुम  हमारे साथ चलने  से इंकार कर रहे हो। यह  हमारे साथ धोखा है । इस तरह काम नहीं चलेगा। तुम्हें हमारे साथ चलना ही पड़ेगा।"

अपने  साथियों की  खरी -खोटी बातें सुनकर सरदार  ने मन में विचार किया  कि  महात्मा जी ने झूठ बोलने से मना किया है ,  न कि चोरी करने से । इसलिए मुझे साथियों की बात मान लेनी चाहिए। येसा विचार कर वह चोरी करने के लिए राजी हो गया।  

रात को सभी चोर सरदार के घर में इकट्ठा  हुए।   चोरी करने  के लिए  वहां से सब  एक साथ निकल पड़े। काले कपडे पहने  सरदार आगे-आगे  बाकी चोर उसके पीछे -पीछे।   काफी कोशिश  के बावजूद उन्हें  कोई अच्छा  मौका नहीं मिला।  वे  निराश हो सोचने लगे की शायद आज उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा। तब सरदार ने उनकी हिम्मत बढाई तथा उन सब को  कुछ और आगे  लेकर गया। आगे जाने पर उनको एक  गाँव दिखाई दिया। सूनसान रात थी ,घुप अँधेरा था, गाँव में सब सोये हुए थे। सब कुछ अपने अनुकूल समझ  उन्होंने एक घर में सेंध लगाई और घर के अन्दर घुस गए। उस घर में सभी सोये हुए थे। इस प्रकार चोरों ने इसे अपने अनुकूल  अच्छा मौका समझा और  जिसके हाथ जो लगा उसे उठा लिया।

 सरदार अपने लिए कोई  कीमती वस्तु  ढूढ़  रहा था।  परन्तु बहुत  ढूढने  के बाद भी उसको कोई कीमती सामान नहीं मिला।  ढूढते -ढूढते वह थक गया। अन्त में उसे एक कटोरा  मिला।कटोरा खीर  से भरा हुआ था। सरदार को बहुत  भूख लगी थी। खीर देख कर उसकी जीभ लुट-पुटाने लगी। वह खीर खाने  ही वाला  था कि  उसको साधू-महात्मा की बताई हुई पहली बात याद आ गई। साधू ने कहा था कि  कोई चीज खाने से पहले पालथी मार कर नीचे जमीन पर  बैठ जाना। भगवान् को भोग लगाना और शंख बजाना। उसके बाद भोजन  ग्रहण करना।

यह  याद आते ही वह घर के आँगन में पालथी मर कर बैठ गया।  भगवान् को भोग  अर्पित किया और  जोर-जोर से शंख बजानी शुरू कर दी ।  शंख की आवाज सुनकर उसके साथी चोर तो पकडे जाने के डर से वहां से भाग निकले।किन्तु सरदार ने यथावत अपना काम जारी रखा। वह शंख  बजाता रहा।  शंख की आवाज सुनकर  घर के सभी लोग  जाग गए। वे दौड़ कर आँगन में आये। वहां चोर को शंख बजाता  देख  सब आश्चर्य चकित रह गए। उन्होंने चोर से कहा-"भाई तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रहे हो ?"

 तब चोर को महात्मा जी की  बताई हुई  दूसरी बात  याद आ गई। महात्मा जी ने कहा था कि  जीवन में   कभी झूठ मत  बोलना।  महात्मा जी का यह वचन याद करके वह  बोला-"भाई! मैं  चोर हूँ और तुम्हारे यहाँ चोरी करने आया हूँ".

 यह सुनकर उस घर के कुछ आदमी उसको मारने को उतारू हो गए। तब एक बुजुर्ग ने उनको समझाते  हुए कहा -"इन्हें  मत  मारो ।  यह चोर नहीं  बल्कि कोंई  साधू-महात्मा हैं। घर में घुसकर चोर  कभी शंख नहीं बजाता  और नहि इस तरह अपने आप को चोर कहता  है।   इनके पाँव  पड़कर सब कोई प्रणाम करो। इनकी पूजा करो।   इनको मारने से तुम्हारा नाश हो जायेगा और  सेवा करने से  कल्याण होगा।'

 घर के  लोगों ने  उस बुजुर्ग की बात पर  विश्वास किया। बारी-बारी  चोर के चरणों में गिरकर सबने उसको प्रणाम किया। अच्छे आसन  पर बैठाया। अच्छे-अच्छे  स्वादिष्ट पकवान बना कर भोजन कराया। सारी रात उसकी सेवा की।  इस बीच  उस  इलाके में यह बात फ़ैल गई कि फलां  गाँव में एक किसान के घर बहुत बड़े महात्मा जी पधारे है। उनके दर्शन से सबका कल्याण होगा। सुबह होते ही चोर के दर्शन करने वालों का ताँता लग गया।  उसको अर्पित करने के लिए लोग फूल-पान आदि तो ले ही आ रहे थे।   धनाढ्य लोग   हीरे जवाहरात आदि  कीमती वस्तुओं की  भेंट चढ़ाकर  सुख शान्ति, धन पुत्र  प्राप्ति के लिए अरदास भी कर रहे थे ।

 चोर  बार-बार बताता   रहा   कि मैं  साधू-महात्मा  नहीं बल्कि   चोर् हूँ। यहाँ चोरी करने आया हूँ।  जितनी बार  वह अपनी इस बात  को दोहराता,  उसके  प्रति लोगो की आस्था उतनी ही प्रबल हो जाती । दिन भर उस चोर की खूब सेवा हुई। उसे धन आदि   बहुत कुछ चढ़ावे के रूप में प्राप्त हुआ। शाम को  गाँव वालों ने चढ़ावे का सारा माल गाड़ियों में भर कर उसके घर पहुँचाया।

 इस प्रकार एक  सच्चे साधु  (गुरु) की दी हुई  सीख को मानकर  नामवर चोर पूर्णतयः बदल गया।  लोग  उसे संत महात्मा मानने  लगे।  उसके   दर्शन  के लिए  हमेशा  भीड़  लगने लगी।  जीवन पर्यंत  कीमती सामान  भेंट  स्वरुप  चदता रहा । निरंतर भगवन का ध्यान करने से   उसके अंदर  आध्यात्मिक  ज्ञान का   संचार हुआ  तथा एक श्रेष्ठ संत का दर्जा प्राप्त  किया। यह होता है संत की संगति का परिणाम :
                                  "संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान,
                                   ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान"

 निष्कर्ष 
भगवान् पर विश्वास करो और  सदा सच बोलो।

पश्ताताप करने  से पाप दूर हो जाते हैं। 






बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

सीताराम यादव

सीता राम यादव (भगत जी)

सीताराम यादव 

भगत जी के नाम से विख्यात सीताराम यादव  का जन्म  उत्तर प्रदेश के जनपद सुल्तानपुर (अब अमेठी)  के एक गाँव शारदान में  20 अगस्त सन 1949 ई. में एक सुखी एवं संपन्न परिवार में हुआ। वह  बहुत ही मिलनसार व्यक्ति हैं। सीताराम का  लालन-पालन इनकी  माता मुन्नी देवी की देख-रेख  में हुआ तथा शिक्षा-दीक्षा  उन्होंने  अपने पिता श्री  राम किशुन यादव की देख-रेख में प्राप्त किया । भगत जी की  प्रारंभिक शिक्षा राजकीय प्राइमरी पाठशाला शारदान में हुई तथा मिडल स्तर की परीक्षा उन्होंने जूनियर हाई स्कूल धरई माफी से उत्तीर्ण  किया।

 उन दिनों छोटी आयु में विवाह कर देने की प्रथा थी।  विवाह के पांच, सात अथवा  नौ  साल  बाद  गौना  लाने की प्रथा थी। उसी प्रथा के अनुसार उनका विवाह भी छः वर्ष की छोटी आयु में  हो गया था  और गौना उसके  सात साल बाद  आया। उनकी  पत्नी गयादेई एक सुशील एवं सभ्य स्त्री है।    उनके परिवार में उनकी पत्नी के अतिरिक्त  स्वामीनाथ  नाम का एक परिश्रमी एवं  होनहार  पुत्र है। वह   राजा   सुखपाल  इंटर कालेज, तिरहुन्त  में अध्यापक  है। ।इनके  चन्द्रावती और रेखा नाम की दो बेटियाँ भी हैं। दोनों विवाहित है और अपने ससुराल में रहती हैं। 

भगत जी का मुख्य व्यवसाय कृषि है।  उसके अतिरिक्त शारदन बाजार में उनका एक छोटा  वस्त्रालय भी है।  दिन में  अक्सर  वह अपने उसी वस्त्रालय में बैठे हुए मिलते है।मृदुभाषी एवं मिलनसार होने के कारण उनके पास  हर समय लोगों का आना -जाना लगा रहता है। सादा जीवन और उच्च विचार उनकी प्रमुखता है। विद्वान और  उदार होने के साथ वे  बांके बिहारी,  भगवान श्रीकृष्ण के परम  भक्त भी हैं और इस  कारण अक्सर उनका वृन्दावन धाम आना -जाना लगा रहता है

।भगत जी को  पंडिताई का अच्छा ज्ञान है।  व्याह-शादियों आदि  के लिए शुभ  मुहूर्त विचारने में बहुत ही माहिर माने जाते हैं।    लोगो के दुःख -सुख में  सदैव तत्पर  रहने  वाले  सीताराम जी का  समाज के हर वर्ग में अच्छा  मान-सम्मान है। 

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

एफ डी आई के तावे पर राजनीति की रोटियां

एफ डी आई के तावे पर राजनीति की रोटियां 

खुदरा व्यापार में  एफ डी आई की अधिसूचना के बाद देश में राजनीति का महौल बहुत गरमा गया है।  विपक्षी दलोँ  के अतिरिक्त सत्तापक्ष की  कई सहयोगी पार्टियाँ  भी  इसका जम कर विरोध कर  रही हैं। इस मुद्दे पर सत्तापक्ष  की कुछ  सहयोगी पार्टियाँ  तो सरकार से समर्थन भी वापस ले चुकी हैं तो कुछ समर्थन  वापसी की धमकियाँ दे  रही हैं।  जोरदार प्रचार के माध्यम से छोटे और  मझोले व्यापारियों के मन में यह कह कर  डर  पैदा किया जा रहा है कि इस  एफ डी आई से उनका व्यवसाय  ही चौपट हो जायेगा, साथ ही  किसानों के  मन में भी भय पैदा किया जा रहा है की  उनकी गाढी कमाई का अधिकांश हिस्सा विदेशी निवेशक हड़प लेंगें। लेकिन मेरा मानना है कि खुदरा व्यापार में  एफ डी आई लाकर सरकार ने सराहनीय कार्य किया है। सरकार को यह कार्य बहुत पहले करना चाहिए था। लाभ - हानि और गुण-दोष  की दृष्टि से देखा जाय तो इसके लाभ तो अनेक है किन्तु हानि कहीं दृष्टिगोचर  नहीं होती . 

खुदरा व्यवसाय  में एफ डी आई के आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी फलस्वरूप गुणवत्ता में सुधार  होने के साथ वस्तुएं सस्ती और सुलभ होंगी। प्रशिक्षित एवं सभ्य  विक्रताओं के व्यव्हार, शालीनता  एवं कार्य कुशलता से  ग्राहक निश्चित रूप से  प्रभावित और आकर्षित  होंगे।  रोजगार बढेगा। युवाओं को अपने प्रदेश में, अपने घर के आस -पास नौकर्रियाँ मिलने लगेगी, तब छोटी-बड़ी नौकरियों  के लिए दूसरे प्रदेशों  में जाकर धक्के नहीं खाने पड़ेंगें। सम्मान पूर्वक सुखी जीवन यापन संभव होगा । क्रय-शक्ति बढ़ने से मंदी का दौर समाप्त होगा, बुनियादी ढांचे में सुधार होगा  और जीवन स्तर ऊँचा होगा। देश का विकास होगा। 

आजकल कृषि का कार्य घाटे का सौदा बन चुका है। फसल तैयार करने के लिए किसान बहुत  कठिन परिश्रम करता है। खाद, बीज, दवाइयों और मजदूरों आदि पर भारी  भरकम रकम खर्च करने के बावजूद उसको उपज  का उचित मूल्य  नहीं मिलता।  परिणाम स्वरुप सबका पेट भरने वाले किसान की  अपनी ही जेब  खाली रहती है। एफ डी आई के कारण  संसाधनों में सुधार होने से  कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुएं सस्ती और सुलभ होंगी। उपज अच्छी और अधिक होगी। उपज की उचित कीमत मिलेगी। किसान खुशहाल  होगा तो निश्चित ही  देश भी खुशहाल होगा।