गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

शुभ-विवाह

 

 मुन्नीलाल यादव के सुपुत्र  चि.भूपेशसिंह व राजबहादुर यादव की सुपुत्री कु. अर्चना 30 नवम्बर 2012
को  परिणय - सूत्र में बँध  गए।  यह शादी चंडीगढ़ के  सेक्टर 33 स्थित समूहिंक केंद्र में बड़े धूम-धाम से संपन्न हुई । मुन्नी लाल यादव जाने-समाज सेवक हैं। समाज में उनका  बहुत मान-सम्मान है। उनकी पत्नी बिमला यादव सरल स्वाभाव वाली धर्म-परायण महिला हैं। वर-वधु को आशीर्वाद देने वालों में अन्य गणमान्य व्यक्तियों के अतिरिक्त दूल्हे राजा के 90 वर्षीय प्रपिता श्री रामनिहोर यादव  भी शामिल थे। सौहादपूर्ण वातावरण में  संपन्न इस विवाह से जहाँ दोनों परिवारों में प्रसन्नता छायी रही, वहीँ बधाई देने वाले शुभ चिंतकों की आवा-जाही से  कई दिनों तक उनके घर  रौनक भी लगी रही।

यादव समाज वर-वधु को शुभ आशीर्वाद  देते हुए कामना करता है कि  वे   सुखी, स्वस्थ्य और 
सम्पन्न  रहे, सदा प्रगति के पथ पर  अग्रसर रहे।  परमपिता परमात्मा उनका जीवन खुशियों से भर दे।   
जय श्रीकृष्णा !



शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

प्रभु पल पल सन्देश देता है

                                       

परमपिता परमेश्वर सृष्टि  के रचयिता है। वे  कण कण में विद्यमान  हैं।  वे सर्व व्यापक और सर्वशक्तिमान  है सृष्टि की  प्रत्येक  वस्तु परमात्मा  के  अंश से निर्मित  है और उनके अधीन है ।  इन्ही  वस्तुओ के माध्यम से   सांकेतिक भाषा में     भगवान जहाँ  भक्तों को  शुभ कार्यों  के प्रति     प्रेरित करते  है  वहीँ तुच्छ कार्यों के प्रति   सावधान  भी करते  है। ईश्वर  ने मनुष्य को सही और  गलत को समझने की  शक्ति दी है।सच्चा  ईश्वर -भक्त समझदार होने के कारण  प्रभु  के  सांकेतिक मार्गदर्शन  को आसानी से समझ लेता है और उसके अनुसार सही मार्ग पर चलते  हुए अमरत्व रुपी फल का  अधिकारी  बनता  है,  जबकि  अंध-विश्वासी नासमझ इंसान  प्रभु की आवाज़  का अर्थ समझने में असमर्थ होता  है।  इस कारण वह  अकर्मण्य बन जाता है   और अकारण  ही  डूब मरता है।

एक  समय की बात है किसी नदी के किनारे एक छोटा सा गाँव था।  गाँव के बाहर  एक  मंदिर था। मंदिर के प्रांगण में एक  बाबा जी रहते थे । उनका एक मात्र काम था मंदिर में पूजा पाठ करना और  भगवान का गुणगान  करना  । वे अपमा गुजर-बसर चढ़ावे के रूप में मन्दिर से  प्राप्त अन्न-धन  से    करते थे ।

 एक बार  नदी में भयंकर  बाढ़ आ गई।  गाँव के सब लोग अपने अपने प्राण बचाने के लिए वहां से भागने लगेलोगो ने बाबा जी को भी वहां से चले  जाने का आग्रह किया।  किन्तु  बाबा जी  नहीं माने । उन्होंने लोगों से कहा-" आप सब  अपने  प्राण बचाइएमेरी चिंता मत कीजिये , मैं सी  मंदिर  में रहूँगा।   यहाँ भगवान  विद्यमान है,  निश्चित  वह  मेरे प्राण भचायेंगें" तब गाँव के सभी  लोग उदास मन से,  बाबा जी के बिना  सुरक्षित स्थान पर चले गए।

 नदी का  जल स्तर पल दर पल  बढ़ता  जा रहा था। स्थिति   भयावह  होती  देखकर  गाँव का एक  मल्लाह    नाव लेकर  आया  और विनीत  स्वर में  बोला -'"महराज  जी!   यहाँ  रहना खतरे  से  खाली  नहीं है। जल स्तर  तेजी से बढ़ रहा है।महराज! आप  इस  नाव  में  बैठ जाइये।  मैं  आपको सुरक्षित स्थान पर पहुँचाये  देता हूँ ।"   

बाबा जी नहीं माने।  उन्होंने मंदिर को  छोड़कर  अन्यत्र  जाने से साफ़ इंकार कर दिया।

पानी तीव्र गति से मंदिर में घुसने  लगा। बाबा जी के डूब जाने का खतरा मंडराने लगा। संयोगवश  बचाव दल के कुछ सैनिक  हैलीकाप्टर  लेकर वहाँ  आये। सैनिकों ने हैलीकाप्टर को ऊपर रोक कर  एक सीढीनुमा   रस्सी नीचे  लटकाई और   बाबा जी को समझाते हुए बोले -"  महात्मा जी !  आप इस रस्सी के सहारे हैलीकाप्टर में आकर  बैठ जाइए अन्यथा  आपके प्राण नहीं बचेंगें।"

 "आप लोग ब्यर्थ परेशान हो रहे हैं , मैं कहीं नहीं जाउंगा, मेरी रक्षा के लिए भगवान स्वयं यहाँ आएंगे।"बाबाजी  ने सैनिको से कहा।

नदी उफान पर थी।   ऊँची ऊँची लहरें उठ  रही थी। भयानक भंवर घुमर रहे थे।   चारों तरफ जल ही जल दिखाई दे रहा था।  बाढ़ ने ऐसा विनाशकारी  रूप धारण किया कि  देखते ही देखते सारा गाँव पानी में डूब गया। बाबाजी भी पानी की  तेज धारा में बहने लगे। मृत्यु को सिर पर मंडराती देख कर बाबाजी डर गए।  उन्हें  प्राणों  का मोह सताने लगा।   बचने के लिए    पानी में  हाथ पाँव पटकने लगे। किन्तु तब  तक बहुत देर  चुकी थी।  चिड़िया खेत चुग कर जा चुकी थी।  बाबाजी के  सभी प्रयत्न बेकार साबित हुए। लहरों के बीच डूबते उतराते हुए उनके प्राण पखेरू उड़ गए।

मरने के बाद जब बाबा जी को  स्वर्ग में  भगवान के सामने लाया गया।   तब उन्होंने   उलाहना देते हुए भगवान से पूछा - "हे जग के पालनकर्ता ! हे भगवन!  मैं  जीवन  पर्यन्त आपकी पूजा-पथ पाठ,भक्ति करता रहा। सदैव आपकी  सेवा में लगा रहा , किन्तु डूबते समय आपने मुझे तनिक भी सहारा नहीं दिया।   मुझे बचाने  नहीं आये । क्या यही है आपकी  भक्ति और  सेवा का फल ?"  

 बाबा जी के मुख से ऐसी  वाणी सुनकर  भगवान ने मुस्करा कर कहा- "महात्मा जी!   मै पल पल आपको बचने का अवसर  देता रहा। आपको बचाने के लिए  मेरे सेवक  तीन  बार आपके पास   आये ,  किन्तु आपने  । सर्वप्रथम    ग्रामीणों के माध्यम से  बचाने का प्रयास किया  जिन्होंने आपको  सुरक्षित  स्थान पर  जाने का आग्रह किया।  आप नहीं माने।  फिर  नाविक   नाव लेकर आया।  और अंत मुझसे  प्रेरित   सैनिक   हैलीकॉप्टर  लेकर  आये.   मै आपको बचाने का प्रयत्न करता रहा, आप  मेरी बात मानने से इंकार करते रहे । अब आप ही बताइए मेरा इसमें  क्या दोष  ? आपने मेरी भक्ति मन से नहीं  तन से की है। आपकी  सेवा दिखावटी थी अन्यथा मानव मुखं से निकली मेरी वाणी को अवश्य पहचान लेते और मेरी बात मानकर सुरक्षित स्थान पर चले जाते ।" 
      
भगवान  के श्रीमुख से ऐसी बात सुनकर बाबा जी  को अपनी गलती का अहसास हुआ। वे समझ गए कि परमपिता परमेश्वर सृष्टि  के रचयिता है। वे  सर्व व्यापक है, कण कण में विद्यमान  हैं सृष्टि की  प्रत्येक  वस्तु परमात्मा  के  अंश से निर्मित  है और उनके अधीन है ।  इन्ही  वस्तुओ के माध्यम से   सांकेतिक भाषा में     भगवान जहाँ  भक्तों को  शुभ कार्यों  के प्रति     प्रेरित करते  है  वहीँ तुच्छ कार्यों के प्रति   आगाह भी करते  है। ईश्वर  ने मनुष्य को सही और  गलत को समझने की  शक्ति दी है।सच्चा  ईश्वर -भक्त समझदार होने के कारण  प्रभु  के  सांकेतिक मार्गदर्शन  को आसानी से समझ लेता है और उसके अनुसार सही मार्ग चलते  हुए अमरत्व रुपी फल का  अधिकारी  बनता  है,  जबकि  अंध-विश्वासी नासमझ इंसान  प्रभु की आवाज़  का अर्थ समझने में असमर्थ होता  है इस कारण वह  अकर्मण्य बन जाता है   और अकारण  ही  डूब मरता है।

प्रभु सचमुच  पल पल सन्देश देता  है। समझदार समझ लेता है, नासमझ डूब मरता है। 


                                           जय श्री कृष्ण!!

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

नंदमहर धाम


नंदमहर  धाम

उत्तर प्रदेश के  अमेठी जिले के मुख्यालय गौरीगंज से मुसाफिरखाना मार्ग पर 16 किलोमीटर की दूरी बसा यह स्थान पौराणिक महत्त्व समेटे हुए है।  यह  यादवों का एक प्रमुख धार्मिक स्थल  है। इस स्थान का प्रादुर्भाव कब हुआ इस विषय में कई मत प्रचलित हैं। एक किंवदंती के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण अपने भाई बलराम के साथ पौंड्रक नामक घमंडी राजा  को मारने के लिए द्वारिका से काशी गए हुए थे। तब वसुदेव और नंदबाबा उनको खोजते हुए यहाँ  आये थे। उस समय यहाँ घना जंगल था। पौंड्रक  को मारकर श्रीकृष्ण बलराम के साथ  द्वारिका वापस  जा रहे थे,  उस  समय नन्दबाबा  और वसुदेव से उनकी मुलाकात  इसी स्थान पर हुई। सभी लोगों ने यहाँ तीन दिन तक विश्राम किया।  उसी दौरान यहां एक यज्ञ का आयोजन भी  किया गया।  नंदबाबा ने भगवान की मूर्ति स्थापित करके उनकी पूजा की थी। श्रीकृष्ण, बलराम, वसुदेव और नंदबाबा के चरणरज से यह स्थान  पवित्र हो गया। यदुवंशियों के पूर्वज होने के कारण  यह स्थान उनकी आस्था, श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बन गया। तभी से लोग यहाँ अनवरत यज्ञ, हवन और  पूजा करते आ रहे हैं। प्रभु की याद में धाम के पड़ोस में बसे तीन गांवों का नाम इस प्रकार है-हरि (श्रीकृष्ण) के नाम पर हरिकनपुर, वसुदेव के नाम पर बसयातपुर और नन्द के नाम पर नदियाँवा। 
.
नन्दबाबा ने जिस स्थान पर पूजा की थी, वहां पहले  मिट्टी का चौरा (चबूतरा) था। किन्तु बाद में, सन 1956 ई. में ,  उस चौरे के स्थान पर मंदिर का निर्माण करावाया  गया। उस मंदिर  के भीतर  मूर्तिकक्ष में प्रत्येक मंगलवार को  गाय और भैंस  का  दूध चढ़ाये जाने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि  गाय भैंस के बियाने के बाद आगामी  पांच मंगलवार  यहाँ दूध  चढाने  से वह गाय भैंस स्वस्थ रहने के साथ  बहुत  दिनों  तक अधिक  दूध देती है। जाति-पाति का भेदभाव किये बिना  सभी धर्मों और समुदाय के लोग बड़ी संख्या में मंगलवार को यहाँ  दूध चढाने आते है।
 .
यह स्थान 'राजाबली' और 'पंवरियां' की पूजा के लिए  बहुत प्रसिद्द है. उल्लेखनीय है कि इस  क्षेत्र के अधिकांश यदुवंशी  'राजाबली' और 'पंवरियां' नामक देवता की पूजा करते हैं। उन पुजारियों को ओझा कहा जाता है। पारम्परिक समाज में मान्यता  है कि ओझा में प्रत्यक्ष दुनिया से बाहर किसी रूहानी दुनिया, आत्माओं, देवी-देवताओं या ऐसे अन्य ग़ैर-सांसारिक तत्वों से सम्पर्क रखने या उनकी शक्तियों से लाभ उठाने की क्षमता होती है। ओझाओं के बारे में यह धारणा भी है कि वे अच्छी और बुरी आत्माओं तक पहुँचकर उनपर प्रभाव डाल सकते हैं और  ऐसा करते हुए अक्सर वे किसी विशेष चेतना की अवस्था में होते हैं। ऐसी अवस्था को  किसी देवी-देवता या आत्मा का 'चढ़ना' या 'हावी हो जाना' कहतें हैं। यह प्रथा कमोबेश आधुनिक समाज में भी मान्य है, किन्तु अधिकांश लोग इसे अन्ध-विश्वास मानते हैं। नंदमहर धाम में आने वाले ओझा लोग  राजबली और पवंरिया के पुजारी होते हैं और विशेष चेतना अवस्था में इनके ऊपर इन्ही देवताओं की सवारी होती है।कई पुजारी  प्रत्येक मंगलवार को नियमित रूप से नन्दमहर धाम आते है और अपने ईष्टदेव अर्थात राजबली महाराज और पवंरिया  के नाम की हवन करते हैं।  पचरा जो कि रिझाने वाला गीत है उसको गाकर महाराज को प्रसन्न करते है और उनकी अलौकिक शक्तियों के द्वारा  कथित उपरी हवा, भूत,-प्रेतों  आदि बुरी आत्माओं से  पीड़ित लोगों का इलाज करते हैं।
.
राजाबली और पवंरिया कौन हैं? इसके बारे में मंदिर के महंत भारतनन्द का कहना है कि रोहिणी नंदन  बलराम को राजाबली  और उनके अंगरक्षक को पंवरिया
कहा जाता है.नेशनल बुक ट्रस्ट,इण्डिया द्वारा प्रकाशित  हिन्दी समातर  कोश में  भी 'बली' का अर्थ 'बलराम (दाऊ)' और   पवंरिया का  अर्थ 'पहरेदार'  बताया गया  है। इससे स्पस्ट होता है कि भगवान् श्रीकृष्ण के भ्राता श्री बलरामजी को राजबली  और उनके सेवक को पवंरिया  कहा जाता है। शक्ति और पराक्रम के  प्रेरणा-श्रोत होने के कारण  लोग बड़ी श्रद्धा और विश्वास से उनकी पूजा करते हैं।
.
प्रति वर्ष कार्तिक मास की  पूर्णिमासी  को यहाँ   बहुत बड़ा  मेला लगता हैं. इसे  नन्दमहर बाबा का मेला कहा जाता है. इसे यादवों का महाकुम्भ भी कहा जाता है। उस दिन वहां  श्रद्धालुयों का जनसैलाब देखते ही बनता है। सुल्तानपुर, फैजाबाद,बाराबंकी, आजमगढ़,  बहराइच, गोंडा, आंबेडकर नगर, प्रतापगढ़, रायबरेली आदि  अनेक जिलों के श्रद्धालु  बड़ी  संख्या में  यहां हरि  दर्शन हेतु आते है। एक अनुमान के  अनुसार दो दिन तक चलने वाले इस यादव-महाकुम्भ  में लगभग एक लाख श्रद्धालु शिरकत करते है।  व्रत धारण किये हुए ओझा लोग यहाँ  हर्ष-उल्लाष के साथ, ढोल नगाड़ों की थाप पर, राजाबली  और पंवरिया की   पूजा  करते है। दीपावली की भाँति मिट्टी के  बने दीयों में जगमगाते  दीप के द्वारा  हवनकुण्ड को सजाया जाता है। तदोपरांत  विधि-पूर्वक  हवन की जाती  है।  सभी पुजारियों का  हवन-कुण्ड अलग-अलग होता है। सामूहिक रूप से हवन करने  की प्रथा नहीं है। मंदिर के  प्रांगण में भक्तों द्वारा राजाबली महाराजऔर पवंरिया के नाम का  'निशान'  चढ़ाये जाने की परंपरा भी  है। यह दृश्य उस दिन का  मुख्य आकर्षण होता  है।  रंग-विरंगे कपड़ों से बने  अनेक  झंडियों वाले  ध्वज या  पताके  को 'निशान' कहा जाता है। निशान चढाने के लिए भक्तगण  मीलों पैदल चल कर, हथेली पर प्रज्वलित दीप थामे, राजबली महाराज के नाम का मन्त्र गुन -गुनाते नंदमहर धाम तक पहुंचते है।  कन्धों  पर  ध्वज उठाये हुए अन्य व्यक्ति उनके पीछे-पीछे चलकर आते हैं।  काबिलेगौर है कि इस दौरान रास्ते  में ना तो ज्योति  बुझने दी जाती  है और नहि ध्वज को पृथ्वी पर रखने दिया  जाता हैं।   ऐसे सैकड़ों  ध्वज  प्रति-वर्ष  यहाँ चढ़ाये जाते हैं। रंग-विरंगे लहराते झंडों से सजा  नन्दमहर धाम उस दिन बहुत  शोभायमान होता  है।

.

जय श्रीकृष्ण
          









जय श्रीकृष्ण