रविवार, 21 अक्टूबर 2012

संत की संगति का परिणाम



बहुत    पहले  की बात है।  किसी   उजड्ड  व्यक्ति  ने  चोरों  का एक गिरोह बनाया  हुआ था। गिरोह में कई चोर शामिल   थे। वह उन सबका सरदार था। रात के अँधेरे में दूर-दराज के  गाँवों में जाकर  चोरी करना उनका नित्य का  काम  था।  चोरी से प्राप्त  धन को बराबर बराबर  बाँट लिया करते थे। उसी से  अपने परिवार का भरण -पोषण करते थे।  यह सिलसिला सालों से चलता  आ रहा था।  इलाके में  रोज कहीं न कहीं चोरी  हो जाया करती थी।  इससे वहाँ  के लोग बहुत परेशान  थे।

सरदार  के घर से थोड़ी  दूरी पर बाग़ था। उसमें  में  सुन्दर सी एक कुटी थी।  कुटी में  सीधे-सादे  किन्तु उच्च विचारों वाला एक साधु  रहता था।  वह  सदैव भगवत-भक्ति में लीन रहता था। एक दिन महात्मा जी कुटी के बाहर  टहल रहे थे। चोर सोद्देश्य उधर से जा रहा था। महात्मा जी के  तेजस्वी और शांत  स्वरुप को देखकर  उसके मन में स्वतः ही सद्गुण आने लगे । उसका कठोर  ह्रदय द्रवित  होने लगा। उसके  मन में महात्मा जी के निकट जाकर उनके दर्शन  करने की अभिलाषा हुई। 

सरदार साधु के पास गया।  उनके  चरणों में गिरकर  दंडवत प्रणाम  किया। महात्मा जी उसके बारे में सब कुछ जानते थे। फिर भी उन्होंने उसका यथोचित सत्कार किया ।  उसका तथा उसके परिवार जनों का कुशल-क्षेम पूछा। चोर ने महात्मा से  कहा, "हे महात्मन !  मेरे यहाँ सब कुशल है। मुझे केवल एक चिंता खाए जा रही है। मैंने जीवन भर चोरीं की  है। दूसरों का धन लूटा है। मेरे पाप की गठरी भर  गई है। आप संत महात्मा हैं। प्रभु के अनन्य भक्त  और बड़े दयालु है। मुझ पर भी कुछ दया कीजिये। मुझे इस पाप से छुटकारा दिलाइये और मेरे उद्धार का मार्ग बताइए।"

चोर  की बात सुनकर महात्मा जी समझ गए कि उसका  ह्रदय परिवर्तित हो रहा  है। पाप कर्मों का त्याग कर अब यह पाश्चाताप करना चाहता है। इसे  सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है। इसे  भगवत भक्ति का कोई सरल उपाय बताना चाहिए, जिससे यह पाप कर्मो  से मुक्ति पा सके।

शांत भाव से  कुछ  देर तक मनन  करने के बाद महात्मा जी ने  चोरों के उस सरदार से  कहा," सरदार! यदि तुम सचमुच अपना कल्याण चाहते हो तो  मेरी  दो बातें   सदा  याद रखनी होगी और उनका पालन करना होगा ।"

 चोर बोला "महात्मा जी!  मैं आपकी बताई  हुई हर बात  याद रखूंगा और  जीवन भर कड़ाई से  पालन करूँगा ।  शीघ्र ही उपाय बताइए।"

तब एक शंख देते हुए महात्मा जी ने उसको  कहा -"हे सरदार! आज के बाद  जब भी  तुम्हें भोजन की इच्छा हो,  तो भोजन ग्रहण करने से  पहले पालथी मार कर पृथ्वी पर बैठ जाना। भोजन का कुछ अंश भगवान् को अर्पित करना।   कुछ देर  तक अपने मन में परमपिता परमेश्वर का  ध्यान  लगाये रखना। फिर यह शंख बजाना और उसके बाद  भोजन ग्रहण करना।"

" महात्मन !  आपके इस उपदेश का मैं सदैव पालन करूंगा। शीघ्र  ही दूसरी बात बताइए।" चोर ने साधु से कहा।

दूसरा मन्त्र देते हुए महात्मा जी ने  कहा-" जीवन में कभी झूठ मत बोलना।इतना कह कर महात्मा जी उठ खड़े हुए और कुटी के अंदर जाकर  प्रभु-भक्ति में लींन  हो गए।  चोर  अपने घर लौट आया।

 चोरों के उस सरदार ने चोरी करना बंद कर दिया।  सरदार के बिना उसके साथी चोरी करने से डरते थे।  इस कारण उन्होंने  भी यह  काम बंद कर दिया ।   चोरी के अतिरिक्त   आजीविका  का अन्य   साधन  उनके पास  था ही  नहीं।  चोरी करना बंद कर दिया तो उनकी आमदनी भी बंद हो गई। दिन प्रतिदिन उनकी आर्थिक दशा  बिगड़ने लगी। अंततः हालात इतने बिगड़ गए कि उनको खाने के लाले पड़  गए। उनके  घरों में कलह शुरू हो गई। बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे। भूख से बिलबिलाते  बच्चों का रोना-धोना उनसे  देखा नहीं गया। तब  उन सबने  पुनः चोरी शुरू करने का निश्चय किया।  इस काम के लिए सरदार का साथ होना आवश्यक था -यह सोचकर वे सरदार  को मनाने उसके घर गए।सरदार  को  सारी  समस्या बताई और    चोरी करने के लिए साथ चलने का  आग्रह किया । सरदार ने  यह  घृणित कार्य पुनः आरम्भ  करने से साफ़ मना  कर दिया। तब उसके साथियों ने कठोर शब्दों में  कहा-"सरदार! हमें बचपन से चोरी करना तुमने ही सिखाया था।  तब  से हम  यही  काम करते आ रहे रहे हैं।  धन  कमाने का  कोई  दूसरा उपाय  हमने  सीखा ही नहीं। यदि तुम इस बुरे मार्ग पर न ले गए होते, तो हम सब ने इज्जत वाला कोई अच्छा काम किया  होता।   चोरी करना बंद कर दिया, तो अब  हमारी  दुर्दशा हो रही है। हमारे घरों में खाने के लिए कुछ  भी  नहीं बचा है । बच्चे भूखे से मर रहे है। यह सब तुम्हारे कारण हो रहा है। अब  तुम  हमारे साथ चलने  से इंकार कर रहे हो। यह  हमारे साथ धोखा है । इस तरह काम नहीं चलेगा। तुम्हें हमारे साथ चलना ही पड़ेगा।"

अपने  साथियों की  खरी -खोटी बातें सुनकर सरदार  ने मन में विचार किया  कि  महात्मा जी ने झूठ बोलने से मना किया है ,  न कि चोरी करने से । इसलिए मुझे साथियों की बात मान लेनी चाहिए। येसा विचार कर वह चोरी करने के लिए राजी हो गया।  

रात को सभी चोर सरदार के घर में इकट्ठा  हुए।   चोरी करने  के लिए  वहां से सब  एक साथ निकल पड़े। काले कपडे पहने  सरदार आगे-आगे  बाकी चोर उसके पीछे -पीछे।   काफी कोशिश  के बावजूद उन्हें  कोई अच्छा  मौका नहीं मिला।  वे  निराश हो सोचने लगे की शायद आज उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा। तब सरदार ने उनकी हिम्मत बढाई तथा उन सब को  कुछ और आगे  लेकर गया। आगे जाने पर उनको एक  गाँव दिखाई दिया। सूनसान रात थी ,घुप अँधेरा था, गाँव में सब सोये हुए थे। सब कुछ अपने अनुकूल समझ  उन्होंने एक घर में सेंध लगाई और घर के अन्दर घुस गए। उस घर में सभी सोये हुए थे। इस प्रकार चोरों ने इसे अपने अनुकूल  अच्छा मौका समझा और  जिसके हाथ जो लगा उसे उठा लिया।

 सरदार अपने लिए कोई  कीमती वस्तु  ढूढ़  रहा था।  परन्तु बहुत  ढूढने  के बाद भी उसको कोई कीमती सामान नहीं मिला।  ढूढते -ढूढते वह थक गया। अन्त में उसे एक कटोरा  मिला।कटोरा खीर  से भरा हुआ था। सरदार को बहुत  भूख लगी थी। खीर देख कर उसकी जीभ लुट-पुटाने लगी। वह खीर खाने  ही वाला  था कि  उसको साधू-महात्मा की बताई हुई पहली बात याद आ गई। साधू ने कहा था कि  कोई चीज खाने से पहले पालथी मार कर नीचे जमीन पर  बैठ जाना। भगवान् को भोग लगाना और शंख बजाना। उसके बाद भोजन  ग्रहण करना।

यह  याद आते ही वह घर के आँगन में पालथी मर कर बैठ गया।  भगवान् को भोग  अर्पित किया और  जोर-जोर से शंख बजानी शुरू कर दी ।  शंख की आवाज सुनकर उसके साथी चोर तो पकडे जाने के डर से वहां से भाग निकले।किन्तु सरदार ने यथावत अपना काम जारी रखा। वह शंख  बजाता रहा।  शंख की आवाज सुनकर  घर के सभी लोग  जाग गए। वे दौड़ कर आँगन में आये। वहां चोर को शंख बजाता  देख  सब आश्चर्य चकित रह गए। उन्होंने चोर से कहा-"भाई तुम कौन हो और यहाँ क्या कर रहे हो ?"

 तब चोर को महात्मा जी की  बताई हुई  दूसरी बात  याद आ गई। महात्मा जी ने कहा था कि  जीवन में   कभी झूठ मत  बोलना।  महात्मा जी का यह वचन याद करके वह  बोला-"भाई! मैं  चोर हूँ और तुम्हारे यहाँ चोरी करने आया हूँ".

 यह सुनकर उस घर के कुछ आदमी उसको मारने को उतारू हो गए। तब एक बुजुर्ग ने उनको समझाते  हुए कहा -"इन्हें  मत  मारो ।  यह चोर नहीं  बल्कि कोंई  साधू-महात्मा हैं। घर में घुसकर चोर  कभी शंख नहीं बजाता  और नहि इस तरह अपने आप को चोर कहता  है।   इनके पाँव  पड़कर सब कोई प्रणाम करो। इनकी पूजा करो।   इनको मारने से तुम्हारा नाश हो जायेगा और  सेवा करने से  कल्याण होगा।'

 घर के  लोगों ने  उस बुजुर्ग की बात पर  विश्वास किया। बारी-बारी  चोर के चरणों में गिरकर सबने उसको प्रणाम किया। अच्छे आसन  पर बैठाया। अच्छे-अच्छे  स्वादिष्ट पकवान बना कर भोजन कराया। सारी रात उसकी सेवा की।  इस बीच  उस  इलाके में यह बात फ़ैल गई कि फलां  गाँव में एक किसान के घर बहुत बड़े महात्मा जी पधारे है। उनके दर्शन से सबका कल्याण होगा। सुबह होते ही चोर के दर्शन करने वालों का ताँता लग गया।  उसको अर्पित करने के लिए लोग फूल-पान आदि तो ले ही आ रहे थे।   धनाढ्य लोग   हीरे जवाहरात आदि  कीमती वस्तुओं की  भेंट चढ़ाकर  सुख शान्ति, धन पुत्र  प्राप्ति के लिए अरदास भी कर रहे थे ।

 चोर  बार-बार बताता   रहा   कि मैं  साधू-महात्मा  नहीं बल्कि   चोर् हूँ। यहाँ चोरी करने आया हूँ।  जितनी बार  वह अपनी इस बात  को दोहराता,  उसके  प्रति लोगो की आस्था उतनी ही प्रबल हो जाती । दिन भर उस चोर की खूब सेवा हुई। उसे धन आदि   बहुत कुछ चढ़ावे के रूप में प्राप्त हुआ। शाम को  गाँव वालों ने चढ़ावे का सारा माल गाड़ियों में भर कर उसके घर पहुँचाया।

 इस प्रकार एक  सच्चे साधु  (गुरु) की दी हुई  सीख को मानकर  नामवर चोर पूर्णतयः बदल गया।  लोग  उसे संत महात्मा मानने  लगे।  उसके   दर्शन  के लिए  हमेशा  भीड़  लगने लगी।  जीवन पर्यंत  कीमती सामान  भेंट  स्वरुप  चदता रहा । निरंतर भगवन का ध्यान करने से   उसके अंदर  आध्यात्मिक  ज्ञान का   संचार हुआ  तथा एक श्रेष्ठ संत का दर्जा प्राप्त  किया। यह होता है संत की संगति का परिणाम :
                                  "संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान,
                                   ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान"

 निष्कर्ष 
भगवान् पर विश्वास करो और  सदा सच बोलो।

पश्ताताप करने  से पाप दूर हो जाते हैं। 






बुधवार, 17 अक्टूबर 2012

सीताराम यादव

सीता राम यादव (भगत जी)

सीताराम यादव 

भगत जी के नाम से विख्यात सीताराम यादव  का जन्म  उत्तर प्रदेश के जनपद सुल्तानपुर (अब अमेठी)  के एक गाँव शारदान में  20 अगस्त सन 1949 ई. में एक सुखी एवं संपन्न परिवार में हुआ। वह  बहुत ही मिलनसार व्यक्ति हैं। सीताराम का  लालन-पालन इनकी  माता मुन्नी देवी की देख-रेख  में हुआ तथा शिक्षा-दीक्षा  उन्होंने  अपने पिता श्री  राम किशुन यादव की देख-रेख में प्राप्त किया । भगत जी की  प्रारंभिक शिक्षा राजकीय प्राइमरी पाठशाला शारदान में हुई तथा मिडल स्तर की परीक्षा उन्होंने जूनियर हाई स्कूल धरई माफी से उत्तीर्ण  किया।

 उन दिनों छोटी आयु में विवाह कर देने की प्रथा थी।  विवाह के पांच, सात अथवा  नौ  साल  बाद  गौना  लाने की प्रथा थी। उसी प्रथा के अनुसार उनका विवाह भी छः वर्ष की छोटी आयु में  हो गया था  और गौना उसके  सात साल बाद  आया। उनकी  पत्नी गयादेई एक सुशील एवं सभ्य स्त्री है।    उनके परिवार में उनकी पत्नी के अतिरिक्त  स्वामीनाथ  नाम का एक परिश्रमी एवं  होनहार  पुत्र है। वह   राजा   सुखपाल  इंटर कालेज, तिरहुन्त  में अध्यापक  है। ।इनके  चन्द्रावती और रेखा नाम की दो बेटियाँ भी हैं। दोनों विवाहित है और अपने ससुराल में रहती हैं। 

भगत जी का मुख्य व्यवसाय कृषि है।  उसके अतिरिक्त शारदन बाजार में उनका एक छोटा  वस्त्रालय भी है।  दिन में  अक्सर  वह अपने उसी वस्त्रालय में बैठे हुए मिलते है।मृदुभाषी एवं मिलनसार होने के कारण उनके पास  हर समय लोगों का आना -जाना लगा रहता है। सादा जीवन और उच्च विचार उनकी प्रमुखता है। विद्वान और  उदार होने के साथ वे  बांके बिहारी,  भगवान श्रीकृष्ण के परम  भक्त भी हैं और इस  कारण अक्सर उनका वृन्दावन धाम आना -जाना लगा रहता है

।भगत जी को  पंडिताई का अच्छा ज्ञान है।  व्याह-शादियों आदि  के लिए शुभ  मुहूर्त विचारने में बहुत ही माहिर माने जाते हैं।    लोगो के दुःख -सुख में  सदैव तत्पर  रहने  वाले  सीताराम जी का  समाज के हर वर्ग में अच्छा  मान-सम्मान है। 

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

एफ डी आई के तावे पर राजनीति की रोटियां

एफ डी आई के तावे पर राजनीति की रोटियां 

खुदरा व्यापार में  एफ डी आई की अधिसूचना के बाद देश में राजनीति का महौल बहुत गरमा गया है।  विपक्षी दलोँ  के अतिरिक्त सत्तापक्ष की  कई सहयोगी पार्टियाँ  भी  इसका जम कर विरोध कर  रही हैं। इस मुद्दे पर सत्तापक्ष  की कुछ  सहयोगी पार्टियाँ  तो सरकार से समर्थन भी वापस ले चुकी हैं तो कुछ समर्थन  वापसी की धमकियाँ दे  रही हैं।  जोरदार प्रचार के माध्यम से छोटे और  मझोले व्यापारियों के मन में यह कह कर  डर  पैदा किया जा रहा है कि इस  एफ डी आई से उनका व्यवसाय  ही चौपट हो जायेगा, साथ ही  किसानों के  मन में भी भय पैदा किया जा रहा है की  उनकी गाढी कमाई का अधिकांश हिस्सा विदेशी निवेशक हड़प लेंगें। लेकिन मेरा मानना है कि खुदरा व्यापार में  एफ डी आई लाकर सरकार ने सराहनीय कार्य किया है। सरकार को यह कार्य बहुत पहले करना चाहिए था। लाभ - हानि और गुण-दोष  की दृष्टि से देखा जाय तो इसके लाभ तो अनेक है किन्तु हानि कहीं दृष्टिगोचर  नहीं होती . 

खुदरा व्यवसाय  में एफ डी आई के आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी फलस्वरूप गुणवत्ता में सुधार  होने के साथ वस्तुएं सस्ती और सुलभ होंगी। प्रशिक्षित एवं सभ्य  विक्रताओं के व्यव्हार, शालीनता  एवं कार्य कुशलता से  ग्राहक निश्चित रूप से  प्रभावित और आकर्षित  होंगे।  रोजगार बढेगा। युवाओं को अपने प्रदेश में, अपने घर के आस -पास नौकर्रियाँ मिलने लगेगी, तब छोटी-बड़ी नौकरियों  के लिए दूसरे प्रदेशों  में जाकर धक्के नहीं खाने पड़ेंगें। सम्मान पूर्वक सुखी जीवन यापन संभव होगा । क्रय-शक्ति बढ़ने से मंदी का दौर समाप्त होगा, बुनियादी ढांचे में सुधार होगा  और जीवन स्तर ऊँचा होगा। देश का विकास होगा। 

आजकल कृषि का कार्य घाटे का सौदा बन चुका है। फसल तैयार करने के लिए किसान बहुत  कठिन परिश्रम करता है। खाद, बीज, दवाइयों और मजदूरों आदि पर भारी  भरकम रकम खर्च करने के बावजूद उसको उपज  का उचित मूल्य  नहीं मिलता।  परिणाम स्वरुप सबका पेट भरने वाले किसान की  अपनी ही जेब  खाली रहती है। एफ डी आई के कारण  संसाधनों में सुधार होने से  कृषि में प्रयोग होने वाली वस्तुएं सस्ती और सुलभ होंगी। उपज अच्छी और अधिक होगी। उपज की उचित कीमत मिलेगी। किसान खुशहाल  होगा तो निश्चित ही  देश भी खुशहाल होगा।